माँ.../ Maa...


माँ तुझमे मैं और मुझमे तू बसती है...

माँ तेरी सूरत मुझे भगवान की मुरत सी लगती है...

माँ तेरी जरा सी आहट सुनकर मेरे चेहरे पे चमक आ जाती है...

माँ तेरा हल्का सा एहसास ही मुझमे साँस भर देता है...

माँ तेरी एक मुस्कान ही मुझमे जान भर देती है...

माँ तेरी बेचैनी भी मुझे बेचैन कर देती है...

माँ तेरी यही है पहचान की हर ममता मे मुझे तसवीर तेरी दिखती है...

माँ जब तेरी आंख से आंसू निकलता है तो मुझे वो मेरे लहू सा लगता है...

माँ जब भी तू घर पर मेरी राह देखती है तो लगता है कि तुझमे मेरी जान बसती है...

माँ जब तू मुझे प्यार से बेटा कहती है तो मेरी नस नस मे जोश भर देती है...

माँ जब भी तू मुझसे नाराज होती है सच कहूं कि मुझसे मेरी जिंदगी रूठी सी लगती है...

माँ जब भी तू चुप चाप रहती है वो हर घड़ी मुझे सांप सी डसती है...

माँ मुझे तू इतना प्यार क्यू करती है कि जब भी मुझे दर्द होता है तो मेरी आवाज़ मे तू निकलती है...

माँ तू इतनी प्यारी लगती है की मुझे तू इस दुनिया मे सबसे से न्यारी लगती है...

माँ जब भी तू बीमार होकर भी घर का सारा काम करती है तो मुझे तू हर हाल मे लड़ने वाले योद्धा सी लगती है...

माँ तुझे मैं कितना भी परेशान करू फिर भी सबसे ज्यादा प्यार तू मुझे ही करती है...

माँ तू कितने रुप बदलती है कभी तू आग का गोला तो कभी शीतल झरने सी लगती है...

माँ जब भी मुझे प्यास लगती है तू नदी बन जाती है...

माँ जब भी मुझे भूख लगती है तू माँ अन्नपूर्णा बन जाती है...

माँ जब भी तू मुझे अपनी गोद मे सुलाती है तो मुझे चैन की नींद आ जाती है...

माँ तेरी हर पल की जिंदगी मुझे जीना सिखाती है...

माँ तेरे बारे मे लिखने को तो इतना है कि कलम भी कम पड़ जाती है...

माँ जब भी तू हसती है मुझे तू सुबह की रोशनी सी लगती है...

माँ तुझमे मैं और मुझमे तू बसती है...